श्री ब्रह्मकन्या विद्यापीठ आंबलगढ़
परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्री दत्तशरणानन्दजी महाराजश्री के पावन सान्निध्य में संचालित
श्री ब्रह्मकन्या विद्यापीठ - आंबलगढ़
भारतीय संस्कृति में प्राचीन ऋषि प्रणित शिक्षा का सर्वथा लोप होना प्रत्यक्ष दिखाई देता है। शिक्षा का सामान्य अर्थ हमारी अंतर्निहित क्षमताओं का प्रकटीकरण ही है। आज के संदर्भ में शिक्षा मात्र सूचनाओं से मस्तिष्क को पूरित करना हो गया है।
शिक्षा का मूल उद्देश्य परम सत्य की अनुभूतिएवं अभिव्यक्ति होना चाहिए जिसका नितान्त अभाव है। आज के युग में इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ईश्वरीय प्रेरणा से परम आदरणीय श्री मगाराम जी और श्री कानाराम जी के परम तप और त्याग के फलस्वरूप परिणति हुई है।
हमारे परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्री दत्तशरणानंद जी महाराज द्वारा संस्थापित श्री ब्रह्मकन्या विद्यापीठ-आम्बलगढ़ (सांचौर) राज. स्थित है जिसमें श्री राजपुरोहित समाज का प्रथम ऐतिहासिक प्रकल्प सिद्ध साबित हुआ है।
हमारी विश्व प्रसिद्ध गो सेवा संस्थान श्री गोधाम महातीर्थ-पथमेड़ा की छत्र छाया में क्रांतिकारी स्वरूप-सृजनात्मक, रचनात्मक और विकासात्मक अभियान ही इसकी नींव में है।
समाज में यह अवमूल्यन स्तर के पतन से उभरने हेतु मील का पत्थर साबित होगा। साथ ही ऋषिकुमारियों के सर्वांगीण विकास का आधार स्तंभ सिद्ध होगा।
कहा जा सकता है कि शिक्षा की सार्थकता सूचनाएँ एकत्रित करने तक ही सीमित नहीं है अपितु इसकी व्यापकता इसी से सिद्ध होती है, जब विद्यार्थी-मानसिक नवोन्मेष, बहु आयामी जीवन प्रबन्धन, सामाजिक विचारशीलता, नैतिकता, राष्ट्रीय-चेतना, सच्चरित्रता के साथ आगे बढ़ता है।
परिचय
भारतीय संस्कृति में प्राचीन ऋषि प्रणित शिक्षा का सर्वथा लोप होना प्रत्यक्ष दिखाई देता है। शिक्षा का सामान्य अर्थ हमारी अंतर्निहित क्षमताओं का प्रकटीकरण ही है।